ध्यान

” ध्यान में अनुसन्धान नहीं छूटना चाहिए | यदि अपने को भूल जाये और लक्ष्य भी छूट जाये तो यह ध्यान का विघ्न होगा | लक्ष्य से कभी दूर न हों और सब छूटकर लक्ष्य बना रहे “
श्री माँ |

ध्यान की परिभाषाएँ
‘ध्यान’ संस्कृत में ‘ध्यै’ धातु से बनता है | इसका अर्थ है सोचना, मनन करना, चिन्तन करना, विमर्श करना, कल्पना करना, याद कलना |ध्यान के लिए अलग-अलग शास्त्र अलग-अलग प्रकार से समझाते हैं | परिभाषाएँ देखिये -1)

  1. “रागोपहतिर्ध्यानम्” – सांख्य दर्शन राग-द्वेष का नष्ट हो जाना ही ध्यान है |
  2. “ध्यानं निर्विषयं मनः” – वेदान्त मन में किसी विषय का न आना ही ध्यान है |
  3. “तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्” – योग दर्शन (3/2) अपने मन का लक्ष्य में एकाग्र हो जाना ही ध्यान है |
    सूत्रार्थ – उसमें प्रत्यय (ज्ञानवृत्ति) की एकतानता (लगातार प्रवाह होना) ध्यान है |
  4. “दर्शन समानाकार वृत्तिः ध्यानम्” – भक्ति दर्शन चिन्तन के बल पर अपनी अभिष्ट वस्तु को प्रत्यक्ष-सा प्राप्त करना ही ध्यान है |
    अपने प्रियतम के स्वरूप, लीला और सेवा आदि का चिन्तन ही ध्यान है | भक्ति दर्शन
  5. “विजातीय प्रत्यय तिरस्कारपूर्वक सजातीय प्रत्यय प्रवाहीकरणम् निदिध्यासनम्” |
    विजातीय प्रत्ययों का तिरस्कार करके सजातीय प्रत्यय का प्रवाहीकरण ही ध्यान (निदिध्यासन) है – वेदान्त
  6. “अनात्मसंस्कारवृत्ति तिरोधानपूर्वक आत्माकार वृत्ति स्थैर्यं ध्यानम्” – वेदान्त
    अनात्माकार वृत्ति का तिरोधान होकर आत्माकार (या परमात्माकार) वृत्तियों की स्थिरता ध्यान है |

श्रीउड़िया बाबाजी महाराज कहते थे कि ध्यान जब कोई करता है तो उसमें दो वृतियाॅं होती हैं। एक वृत्ति स्वरूपको देखती है और दूसरी वृत्ति स्मरण करती हैं। पहले जब ध्यान प्रारम्भ करते हैं तो स्मरण की प्रधानता चलती है और जो स्वरूपको देखनेवाली वृत्ति है वह गौण रहती है, स्मरणवाली मुख्य रहती है। बादमें जितनी-जितनी ज्ञानकी गाढता बढ़ती जाती है तो वृत्ति स्वरूपमें रहती है, जो स्वरूपको देखती है, स्वरूप को देखनेवाली जो वृत्ति है उसकी प्रधानता हो जाती है ध्यान में, और जो स्मरण करनेवाली वृत्ति है वह गौण हो जाती है |

ध्यान की भूमिकाएँ

परमात्मा की कृपा से हमारा ध्यान सूक्ष्म होता गया तो पहले तो हमने पदार्थों से अपने मन को रहित कर दिया | उसके बाद संस्कारों से रहित कर दिया | हमारा मन जो आकारों में आकारित होता है – भावाकार, अभावाकार, स्त्रियाकार, पुरुषाकार, आकाशाकार इत्यादि बहुत से आकारों में आकारित होता हैं, उसको बोलते हैं ‘वृत्ति’ |
वृत्ति माने व्यापार – मनो वृत्ति, बुद्धि वृत्ति माने मन का व्यापार, बुद्धि का व्यापार | वृत्ति शून्य कर दिया का अर्थ है कि बाहर के विषय की भी कुछ उथल-पुथल नहीं हो रही है और अन्दर की भी नहीं हो रही है |
पदार्थ शून्यता में बाह्य विषय हटे,
संस्कार राहित्य में संस्कारों के घेरे टूट गये
और अब वृत्ति शून्यता में निर्विषय मन किसी आकार को पकड़ नहीं रहा | वृत्ति शून्य कर दिया | ये वृत्ति शून्यता, यहाँ तक का जो ध्यान है, यह हमारे योगवाली भूमिका में ही आ जाता है |

आप देखिये शून्य की बात | हम स्वयं शून्य हो गये, शून्य रूप हो गये – यह हमारे बौद्धों का ध्यान है | वे शून्य हो जाते हैं, इसलिए उनकी आत्मा का उच्छेद हो जाता है | कहा – हमने देख लिया, जान लिया आत्मा शून्य रूप है अर्थात् अभाव रूप है | वेदान्त ने कहा – नहीं –
”न किञ्चित् चिन्तयेद् योगी सदा शून्य परो भवेत् |
न किञ्चित् चिन्तनादेव परमात्मा प्रकाशते ||”
अर्थ- योगी कुछ भी चिन्तन न करे और सदा शून्य से पर हो जाये | कुछ भी चिन्तन न करने से ही परमात्मा प्रकाशित होता है |
जो परमात्मा से जुड़ना चाहता है, वह कुछ चिन्तन नहीं करे |
अर्थात् पहले की भूमिकाओं को भी ले लीजिए | विषय से, पदार्थ से शून्य कर दें, संस्कार से शून्य कर दें और वृत्ति से शून्य कर दें |
तो शून्य रूप हो जाये क्या? तो कहा- नहीं, जब शून्यरूपता हो जाती है तो उस शून्यरूपता को देखा किसने?उस शून्यरूपता को देखनेवाला कोई है या नहीं?
यदि उस शून्य को अर्थात् अभाव को किसी ने देखा, तो देखनेवाला मौजूद था | और हम श्रुति प्रमाण से कहते हैं कि, वह सच्चिदानन्दघन है |
यदि तुम कहते हो कि नहीं, उस शून्य को किसी ने नहीं देखा, तो जिसको किसी ने नहीं देखा तो उसके होने में क्या प्रमाण! वह सिद्ध कैसे होगा? जिस शून्य को किसी ने देखा नहीं वह सिद्ध कैसे होगा?
दो श्रुतियाँ हैं-
“न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यतेSविनाशित्वात् |”
“अविनाशी वा अरेSयमात्मानुच्छित्ति धर्मा |”
ये आत्मा अविनाशी है,
उसका कभी नाश नहीं होता है इसलिए कहा ‘सदा शून्य परो भवेत्’ कुछ चिन्तन न करके और उस अभाव का भी द्रष्टा बने | ‘शून्य परो भवेत्’ अर्थात् शून्य से भी पर होकर उस शून्य को देखे | क्योंकि, यदि इस स्थिति में रहेगा तो परमात्मा का प्रकाश हो जायेगा – ‘ न किञ्चित् चिन्तनादेव परमात्मा प्रकाशते’ |
अब वेदान्त का ध्यान क्या है?

ये कर्तापना, भोक्तापना बडी़ दृढ़ता से आपने पकड़ लिया है क्योंकि, आप समझते हैं विषय में सुख है और संसार सच्चा है | जब सुख बुद्धि नहीं होगी तो आप उस कर्तृत्व भोक्तृत्व और संसारित्व को छोड़ देंगे | जहाँ कर्तापने और भोक्तापने का उल्लेख नहीं है वहाँ बात ही दूसरी है |
कर्तृत्व और भोक्तृत्व उल्लेख से जो शून्य हैं, संस्कार और वासना नहीं है, ऐसा जो शुद्ध सत्वमय, आभासमात्र अन्तःकरण है, उस अन्तःकरण में अपने विशुद्ध आत्म स्वरूप का प्रतिबिम्बन होता है उसे वेदान्तों का ध्यान कहते हैं |
निर्वासन आभासमात्र अन्तःकरण में जो सच्चिदानन्दघन एक अद्वितीय परब्रह्म परमात्मा का प्रतिबिम्बन होता है वहाँ उसे ही विशुद्ध बुद्धि कहेंगे | यही बुद्धियोग है | उसे विशुद्ध बुद्धि कहे या निर्वासन अन्तःकरण | इस विशुद्ध बुद्धि में झिलमिल-झिलमिल प्रतिबिम्ब जो झलकता है आत्म चैतन्य, उसको देखते रहना, ये वेदान्त का ध्यान है | बुद्धि विशुद्ध है अर्थात् अपनी पृथक् सत्ता नहीं दिखाती | ऐसे ध्यान में आपको स्पष्ट हो जाता है कि, आत्मा ही आनन्द स्वरूप है |

महाराजश्री

वेदान्त में तीन तरह का ध्यान माना जाता है:

  1. बहिरंग साधन के रूप में जो समाधान है वह ध्यान है | उसका स्वरूप है: “ध्यानं निर्विषयं मन:” – मन में विषय न आना ध्यान है | यह ध्यान मन की शुद्धि का साधन है |
  2. अन्तरंग साधन के रूप में जो ‘निदिध्यासन’ है, वह ध्यान है | इसमें अनात्माकार वृत्ति का तिरस्कार है और आत्माकार वृत्ति का प्रवाह है | असल में यह ध्यान नहीं ध्यान की इच्छा है | “ध्यायतीव”- ध्यान जैसा होता है | यह तत्त्व साक्षात्कार के अत्यन्त समीप है | ‘दिध्यासा’ है यह, ध्यान नहीं |
  3. तीसरा ध्यान तत्त्वज्ञानी का है | ‘मैं कर्ता-भोक्ता हूँ’ यह ज्ञान मन में उदय न हो; वासना का स्पर्श मन में न हो, और शुद्ध सात्त्विक प्रतीति रूप अन्तःकरण में झिलमिल – झिलमिल आत्मा का प्रतिबिम्ब हो – बस यही ज्ञानी का ध्यान है | ध्यान माने परमात्मा का स्फुरण!
    ध्यान साक्षात्कार से पूर्व योग्यता प्रदान करता है | तत्त्व ज्ञान भेद नहीं मिटाता, भेद-भ्रम मिटाता है | नीलिमा का आकाश में भासना दूसरी चीज है और आकाश के स्वरूप में नीलिमा को सत्य मानना दूसरी चीज है | वेदान्त ज्ञान दुनिया का भान नहीं मिटाता उसमें ब्रह्मातिरिक्त सत्य का जो भ्रम है, उसको मिटाता है | परन्तु तत्त्व ज्ञान के अनन्तर भी यदि ध्यान किया जाये तो वह प्रपंचका भी अभान कर देता है |

श्री उडि़या बाबाजी

  • एकान्त देष, तृष्णाहीनता, अप्रयत्न और प्राणायाम-ये चार बातें ध्यानी के लिए अनिवार्य है |
  • लय, विक्षेप, कषाय और रसास्वादन – ये चार ध्यानाभ्यास के प्रधान विघ्न हैं | इनके कारणों का विभाग इस प्रकार किया जा सकता है –
    लय का कारण-अतिभोजन, अन्न का न पचना, प्रपंच में क्रीडा, व्यर्थ प्रलाप, निद्राकी न्यूनता अथवा अत्यधिकता तथा मादक द्रव्यों का सेवन!
    विक्षेप का कारण-अनात्म पदार्थों में सत्यत्वबुद्धि तथा आसक्ति।
    कषाय का कारण-मन को भोगों से हटाने में जो क्लेश होता है, उसके कारण मन पर दया करना।
    रसास्वाद का कारण-अल्प सुख में कृतकृत्यता मान लेना।

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