धर्म

धर्म में श्रद्धा ही श्रद्धा हो सो नहीं | इसमें विचार भी है, इसमें विवेक भी है, इसमें तत्त्व भी है |

श्री श्री माँ

शास्त्र में धर्म का तात्पर्य क्या है?

उ.धर्म कर्म विशेष है I शास्त्र के द्वारा यह विहित किया जाता है अर्थात् इसका विधान किया जाता है।
धर्म में एक रोधक शक्ति होती है । जो धर्म है जीवन में वह जीवन को सुखी करने की एक कला है ।
‘ अविरोधि तु यो धर्मो स धर्मो मुनि पुँगवः’
धर्म ऐसा होता है जो किसी का विरोध नहीं करता ।
यदि आप धर्म अपने जीवन में अपनाये हुए हैं तो राग द्वेष की निवृत्ति होनी चाहिए और अल्प से भूमा की ओर गमन करेंगे।
अल्प से भूमा की ओर गमन यह धर्म है, उसको धर्म कहेंगे।
धर्म जो शब्द है वह ‘धृत्-धारणे’ धातु में ‘मन्’ प्रत्यय लगाने से बनता है | ’मन्’ प्रत्यय जो है वह कर्ता के अर्थ में, करण के अर्थ में और कर्म के अर्थ में, प्रयुक्त होता है इसलिए धर्म के बहुत अर्थ हो जाते हैं ।
‘धरति इति धर्मः’
जो सबको धारण कर्ता है उसे धर्म कहते हैं ।
ध्रियते लोका अनेन इति धर्मः
वहाँ करण की उत्पत्ति हो गयी।
जिसके द्वारा सम्पूर्ण लोक धारण किया जाता है उसे कहते हैं धर्म ।
‘ध्रियते यः स धर्मः’ –
जो सत्पुरुषों के द्वारा किया जाता है उसे धर्म कहते है । सत्पुरुषों के द्वारा जो कर्म होता है वह धर्म है।
सत्पुरुषों के द्वारा जो धारण किया जाये वह धर्म है।
वहाँ कर्म के रूप में प्रयुक्त होगा |
सदंश में यह धर्म होता है ।
हमारा धर्म भी अपौरुषेय है । सनातन, वैदिक धर्म का अपौरुषेयत्व, वह ब्रह्म विद्या से, इस परा विद्या से ही सिद्ध होता है नहीं तो धर्म का अपौरुषेयत्व नहीं सिद्ध होगा ।
एक होता है बहिरंग धर्म, दूसरा अन्तरंग धर्म और तीसरा परम अन्तरंग धर्म।
१. बहिरंग धर्म — यह धर्माचरण है |
२. अन्तरंग धर्म – यह उपासना है।
३.परम अन्तरंग धर्म –
योग है।
योग से आत्म दर्शन होता है।
जब सत् और चित् दोनों की शुद्धि होगी तभी यह सृष्टि विवर्त रूप में भासेगी इसलिए दोनों की शुद्धि होनी चाहिए।

सनातन धर्म में धर्म का बहुत महत्व है, क्यों? इसको कृपया सझाइये?

उ.जब आपके जीवन में धर्म होगा, जब आप अपने को संयमित कर सकेंगे, अपना निर्माण करेंगे तो या तो कर्म के कर्तापने का त्याग होगा अथवा विवेक से कर्तापने को भगवान् के प्रति समर्पित कर दोगे।
“स्वकर्मणा तमभ्यर्च्यं सिद्धिं विन्दति मानवः “।(गीता१८/४६)
भगवान् कहते हैं अपने कर्मों का अर्पण करते हुए सिद्धि को प्राप्त करते हैं |
जो राग-द्वेष को शिथिल न करे, चेतन को उर्ध्व की ओर न ले जाए, वह धर्म धर्म नहीं है |
धर्म संकीर्णता और विभेदों को पुष्ट नहीं करता, वरन मिटाता है |
धर्म के साथ एक शान्ति अनुस्यूत है |
यह एक ऐसी पवित्र विद्या है, युक्ति है, जो दुर्लभ वैराग्य में पर्यवसित होती है |
धर्म का परिपक्व रूप वैराग्य है, जो मनुष्य का आन्तरिक बल है | यदि वैराग्य न्यून लग रहा है, तो पीछे मुड़कर सिंहावलोकन करो कि धर्म के प्रति कितनी सावधानी जीवन में है?
“अयं तु परमो धर्मो यद् योगेनात्मदर्शनम् |”
धर्म आचरण में रहता है | आचार-सदाचार, अनाचार-दुराचार को काटने के लिए होता है |
जितनी अधिक वासना होगी, उतने अधिक उपचार होंगे | जितने अधिक उपचार होंगे उतनी अधिक वासना होगी | निर्वासनता तो मौन होना ही है |
इस प्रकार से कर्मकाण्व भी तभी तक है जब तक वासनाओं का आधिक्य है |
जो कर्त्तव्य प्राप्त हैं, उसे सम्यक और सुचारु रूप से करना ही धर्म है |
धर्म हमें लोभ, मोह, राग, पक्षपात या आसक्ति से बचाता है |
अर्थात् हमारी संकीर्णता तथा पाशविक वासनाओं को निवृत्त करके हृदय को निर्मल बनाता है |
आप धर्म के मार्ग पर चलें | धर्म ही आपको जीवन में आगे का उत्कृष्ट और अधिक उत्कृष्ट मार्ग भी बता देगा
“धर्मो रक्षति रक्षितः”
हित’, यह हित शब्द हमारा वैदिक है |
कोई अहिंसा को बडा़ मानते हैं, कोई करुणा को बडा़ मानते हैं, कोई अनुशासन को बडा़ मानते हैं, कोई प्रार्थना को बडा़ मानते हैं, ये सब मजहब हैं |
लेकिन, हम लोगों ने, वेद ने कहा जिससे सब का हित हो वही धर्म है |
हित अर्थात् कल्याण|

महाराजजी

सनातन धर्म के अनुसार धर्म का अधिकारी कौन होता?

उ.धर्म के अधिकारी में यह चार बातें होनी चाहिए |
१)अर्थी – धर्म से जो चीज मिलती है उसे चाहता हो |
२) समर्थ – जिस काम को करने से वह चीज मिलेगी, उसको करने में समर्थ हो |
३)विद्वान – समझता है कि इस साधन से साध्य की प्राप्ति कैसे होगी |
४)शास्त्रेण अपर्युदस्त – किसी ने टोका न हो |
यदि कोई मना करता है कि तुम्हें यह धर्म करने का अधिकार नहीं है फिर उसको यदि करने चलेंगे, वासना के आवेश से करने चलेंगे, अहंकार के जोर से करने चलेंगे | और अहंकार के जोश से, वासना के आवेग से निषेध का उल्लंघन करके चलेंगे तो वासना और अहं के कारण वहाँ धर्म दूषित हो जाता है |

सनातन धर्म को दैनिक जीवन में कैसे समझे और अपनाये कृपया निरूपण करें?

उ.महाराजश्री सनातन धर्म की सोलह कलायें बताते हैं –

1)आत्मा सत् है, 
अतः इस सिद्धान्त के अनुसार चार कलाएँ सिद्ध होती हैं –
१)हम अब तक कभी मरे नहीं हैं, आगे मरेंगे नहीं, इसलिए मृत्यु का डर अपने स्वरूप के धर्म के विपरीत है | निर्भय होकर अच्छे काम करने चाहिए |
२)जैसे हमारी आत्मा अमर है, वैसे दूसरों की भी है | अतः किसी के मन में मृत्यु का भय उत्पन्न करना अधर्म है |
किसी की मृत्यु का निमित्त मत बनिए |
३)आत्मा सदा रहने वाला है अतः जीवन निर्वाह के लिए उद्योग करना धर्म है |
४)अपने ही समान दूसरों को जीवित रखने का प्रयत्न धर्म है |
इन दो कलाओं में उन सभी तत्त्वों का समावेश हो जाता है, जो जीवन उपयोगी हैं |
निवास स्थान, अन्न, वस्त्र, औषध आदि की सब के लिए सुविधा करना धर्म है |

2)आत्मा चेतन है 
कोई भी अपने को जड़ अनुभव नहीं कर सकता | अनुभव ही तो चेतन है, अतः १)किसी को अज्ञानी बनाना, ठगना, धोखा देना अधर्म है |
२)स्वयं अज्ञानी-बेवकूफ रहना अथवा ज्ञान के क्षेत्र में ठगा जाना अर्थात् पाखंड का आखेट हो जाना अधर्म है | ३)सबको ज्ञान देना, पाठशाला, वाचनालय, सत्संग-सभा आदि की सुविधा देना धर्म है |
४)स्वयं भी ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करना धर्म है | जो ज्ञान है, उसकी रक्षा कीजिये, बढा़इये, और जो नहीं है, उसे प्राप्त कीजिए |

3)आत्मा आनन्द स्वरूप है, अतः 
१)किसीको किसी प्रकार दुःख मत दीजिए |
२)स्वयं किसी भी कारण से दुःखी मत होइये |
३)स्वयं सुखी रहिए |
४)दूसरों को सुख दीजिए |

4)आत्मा अद्वैत है, अतः
१)समाज में फूट मत डालिए |
२)स्वयं किसी से अलगाव का भाव मत रखिए |
३)सबसे मिलकर रहिए |
४)सब में मेल-मिलाप कराने का प्रयत्न कीजिए |
इन सोलह कलाओं में सामान्य धर्म के सब तत्त्वों का समावेश हो जाता है |